तुम चलते रहो बुधीराम कि हमारी सरकारें बेदिल हैं...!



      <  प्रवीण शर्मा

हैलो हिन्दुस्तान आंखो देखी

शरीर पर मटमैले कपड़े, पैरों में घिसी हुई चप्पल, पीठ पर लदा बैग, धूल से सने बाल और धूप से झुलसा चेहरा...ये जयराम हैं। मुकाम कुशीनगर, उत्तरप्रदेश।  हाल मुकाम आग उगलती कोलतार की सडक़ें... जयराम अपने साथी मजदूरों के साथ चार दिन पहले नासिक से कुशीनगर के लिए चले थे।  अधिकतर  रास्ता पैदल चले।  बीच  में  कोई ट्रक या दूसरा लोडिंग वाहन वाला बैठा  लेता और फिर बीच में कहीं छोड़ देता। सडक़ किनारे कोई दयालु संस्था या सरकारी कर्मचारी कुछ खाने-पीने को दे देते। कुछ खा लेते, कुछ आगे के लिए बचाकर रख लेते...थोड़े विश्राम के बाद फिर से अपने घर की ओर कदम बढ़ा देते।  वे  इस समय  इंदौर को बाय-पास कर गुजरती सडक़ पर हैं।  उनका घर अब भी हजार-बारह सौ किलोमीटर दूर है। पिंडलियां भर आई  हैं, पैरों में छाले हैं, पोरों से खून भी रिस रहा है और पूरा शरीर थका हुआ है।...मगर, जयराम का मन नहीं थका है।  मन में तो बस अपने घर पहुंचने की आस जागी  हुई है।  उनकी आंखों में एक आस टिमटिमा रही है। अपने गांव, अपनी मिट्टी, अपने मां-बाप, अपनी पत्नी और बच्चों से मिलने की आस! पत्नी प्रमिला सुबह-शाम जयराम को फोन करके पता करती है कि कहां तक पहुंचे, चना-चबैना मिल रहा है कि नहीं? कुछ हाल अपने सुनाती है, हिम्मत बंधाती है और अंत में कांपते स्वर में यही कहती  है-चलते रहो, पर अपना पूरा ध्यान रखना।  रस्ते में बीमार पड़ गए तो कौन देखेगा...! जयराम की छलक उठी आंखों में खुशी भी है कि कोई तो उसकी भी राह देख रहा है, किसी को तो उसकी चिंता है!
प्रमिला गलत नहीं कहती। भरी गर्मी में चलते-चलते कई प्रवासियों के पैरों ही नहीं, हिम्मत ने भी जवाब दे दिया है।  वे  और मुसीबतों का सामना नहीं कर सकते थे, सो मौत  ने उन्हें थपकी दे-देकर अपनी गोद में सुला लिया...! कभी सडक़ चलते गिर पड़े, कभी बीमार होकर चल बसे, कभी किसी वाहन से कुचलकर...तो कभी रेल की पटरियों पर सिर टिकाकर सो रहे इन थके-हारों को मौत लोरी सुनाते हुए अपने साथ ले गई...! सोचिए, वे थककर कितने चूर रहे  होंगे कि कर्कश शोर मचाते, धड़धड़ाते आती हुई मालगाड़ी की आवाज भी उनको जगा न सकी...!  और  फिर धड़  एक ओर, तो गर्दन दूसरी तरफ फिंका गई... हमारी सरकारों, अधिकारियों, उद्योगपतियों और समाज को तो इन मजदूरों पर दया नहीं आई, लेकिन मालगाड़ी ने दया दिखाई और पल भर में उनके सारे कष्ट हर लिए...! सच कहता हूं, अब उन्हें कभी कोई कष्ट नहीं होगा!
नेताओं की रैलियों के लिए चुटकियां बजाते सैकड़ों बसों की व्यवस्था कर देने वाले कलेक्टरों, पुलिस अधीक्षकों, आरटीओ अधिकारियों को इन प्रवासियों की पीड़ा सच में दिखाई नहीं देती...?  या वे इन्हें बसों में बैठाकर अपने जिले की सीमा से दूसरे जिलों की सीमाओं तक नहीं छोड़ सकते? या अपने-अपने राज्य की सीमाओं पर इनका सामान्य स्वास्थ्य परीक्षण कराकर इन्हें उत्तरप्रदेश, बिहार या अन्य राज्यों की सीमाओं तक नहीं पहुंचाया जा सकता?  स्थानीय अधिकारी यदि बीमारी से निपटने में लगे हुए हैं तो भोपाल, लखनऊ, पटना, जयपुर, मुंबई, कोलकाता और नई दिल्ली में बैठी सरकारों और परम-बुद्धिमान अधिकारियों को इतना भी विचार नहीं आता? क्या ये दुर्भाग्यशाली केवल पुलिस की लाठियां खाने और ऑटो रिक्शा, लोडिंग रिक्शा, मेटाडोर, ट्रकों में मनमाने किराया वसूलने के बावजूद भेड़-बकरियों की तरह नारकीय यात्रा करने को अभिशप्त हैं?
ऐसा नहीं  है  कि  सारे पुलिसकर्मी डंडे मार रहे हैं या आगे जाने से रोक रहे हैं। बहुतेरे पुलिसकर्मी व अन्य अधिकारी सहायता भी कर रहे  हैं  और  ट्रकों व दूसरे मालवाहकों को रोककर मजदूरों को बैठा भी रहे हैं। इंदौर के उद्योगपति, कॉलोनाइजर (क्रेडाई), समाजसेवी संस्थाएं बाय-पास से गुजरने वाले हर व्यक्ति को  नाश्ते-पानी व भोजन की व्यवस्था बहुत सेवाभाव से कर रहे  हैं।  नासिक  से  चलकर महाराजगंज जा रहे बुधीराम कृतज्ञ भाव से बताते हैं- ‘एमपी में जगह-जगह लोग  हमें खाना- पानी दे रहे  हैं। ऐसे लोग सब जगह नहीं मिलते!’ बुधीराम को शायद अनुभव न हुआ  हो, लेकिन पूरे भारत में यह दयाभाव इस समय एक जैसा है। जिसकी जितनी सामथ्र्य है, वह जरूरतमंदों की मदद कर रहा है। कुछ निष्ठुर, लालची और दुर्जनों के लिए सारी मानवता को नहीं कोसा जाता, यह बात बुधीराम खूब जानता है। वह कहता है- ‘ऊपर वाला हमारी दया देखने वालों पर भी दया दिखाएगा।’ बुधीराम अपना यह शाप छुपा लेता है कि ऊपर वाला दूसरी तरह के लोगों को भी कभी तो देख ही लेगा!
मैं देख रहा हूं कि एक के बाद एक  मजदूरों  के  रेले बाय-पास को रौंदते हुए आगे बढ़ते ही जा रहे हैं। कोई भी थकान और कोई भी मुश्किल उनका रास्ता रोकने में असमर्थ है।  उनके पैर अपने गांव की मिट्टी में  लथपथ  होने  के  लिए  व्यग्र हुए जा रहे हैं। मां-बाप के आशीष के लिए उठे हाथ, राह तकती पत्नी की डबडबाई हुई प्रेमिल आंखें और बच्चों की किलकारियां उनके कानों को अभी से सुनाई पडऩे लगी हैं...वे खुली आंखों से सपना देख रहे हैं...उनका गांव उन्हें पुकार रहा है...सारा गांव उमड़ आएगा अपने इन लाड़लों के साहस को सराहने! सबके पास सुनाने को कोई कहानी होगी। बल्कि, कई-कई कहानियां होंगी... देखो, हम हर बीमारी, हर बाधा को मुंह चिढ़ाकर, पैरों तले रौंदकर जिंदा लौट आए हैं। अपने-अपने गांव वालों को देने के लिए हजारों बुधीरामों और जयरामों के पास यही सबसे बड़ा उपहार है कि वे अपनी सांसों को सहेजकर वापस गांव तक ले आए हैं। बरसों-बरस सारा गांव उनके जीवट की कहानियां सुनाया करेगा... बुधीराम के सूखे होंठों पर मुस्कान तैर गई है... उसकी आंखों को सडक़ नहीं, पत्नी का प्रेम में लिपटा चेहरा दिखाई दे रहा है...बुधीराम के कदम तेज हो चले हैं, उसके होंठों पर कोई गीत फूट पड़ा है और उसकी आंखों में कोई शरारत-सी सज गई है...!