राजबाड़े के कांधे पर सिर रखकर सुबक रहा है इंदौर...!


<  प्रवीण शर्मा

कान लगाकर सुनिए, तो आपको राजबाड़ा की सिसकियां सुनाई देंगी... जैसे सुबकते हुए कह रहा हो- ये क्या हो गया है मेरे इंदौर को ! क्या हुआ कि सारा नगर सहमा और रुका हुआ-सा है? 
सैकड़ों बरसों से सीना ताने खड़े राजबाड़े ने कभी अपने शहर को इतना सहमा, इतना दु:खी, इतना असहाय और इतना गुमसुम नहीं देखा। उसने तो शुरू से ऐसा उत्सवप्रिय शहर देखा है, जो बात-बेबात पर आसमान सिर पर उठा लिया करता था! दिन भर और देर शाम तक मची आपाधापी और धमाचौकड़ी से थककर जब राजबाड़ा अपने सुनहरे अतीत की यादों की पोटली पर सिर रखकर सोने जा रहा होता, कि कोई जुलूस ढोल-ढमाके के साथ उसे जगा दिया करता...अभी से क्या सोते हो, जब सारा शहर जाग रहा है...! फिर राजबाड़ा भी अपने उनींदेपन को झटककर उत्सव का हिस्सा बन जाता, कभी-कभी तो वह भी युवाओं के साथ हुल्लड़ भी मचाने लगता! इसलिए रातों में राजबाड़ा प्राय: जागा ही रहता। कभी बहुत थककर चूर हो जाता, तो कनखियों से नींद चुरा लिया करता...! 


           आज राजबाड़ा को सताने, जगाने कोई नहीं आता! जुलूस और ढोल नगाड़े तो छोडि़ए, कोई जोर का ठहाका सुने इस राजमहल को कोई डेढ़ माह बीत गया। हर तरफ वीरानगी है। कुछ पुलिसकर्मी खड़े रहते हैं और सायरन बजाती गाडिय़ां और एम्बुलेंस नीरवता को बेध जाती है। कभी राजबाड़े को शंका भी होती है कि कहीं उसके इंदौर पर कोई हमला तो नहीं हो गया, कि सारे नगरवासी लड़ाई लडऩे चले गए...?
 अब राजबाड़े को कौन बताए कि इंदौर पर ही क्या, पूरी दुनिया पर हमला हुआ है और हर कोई इस हमले से भयभीत है। हर तरफ हाहाकार मचा है। कोई ठीक से नहीं जानता कि इस हमलावर दुश्मन से कैसे बचा जाए? क्योंकि यह ऐसा दुश्मन है जो दिखाई ही नहीं देता! जैसे वह कोई मायावी है, जो पता नहीं कब, कहां, कैसे और किस पर धावा बोल दे! लोग जान गए हैं कि इस बार उनका दुश्मन कपटी ही नहीं, कायर भी है, जो छुपकर, पीठ पीछे से वार करता है।....और प्राय: संभलने का मौका भी नहीं देता। दुनिया भर में धीरे-धीरे सैकड़ों, हजारों और लाखों लोग उसकी चपेट में आ गए हैं और उनमें से कई तो फिर कभी न उठने के लिए सो गए हैं...!  कोई चीत्कार, कोई रूदन फिर राजबाड़ा को जगा देती है। किसी मां ने अपना जवान बेटा खो दिया है और उस  मां का विलाप राजबाड़े का कलेजा फाड़े दे रहा है...!  उसकी लाचारी देखिए कि वह दुखियारी मां के आंसू भी नहीं पोंछ सकता...! वह ढांढस के दो बोल बोलने को होता कि फिर कोई प्रलाप उसकी छाती चीर देता। फिर किसी परिवार के सर्वेसर्वा, किसी बुजुर्ग, और किसी के पिता, माता, भाई, बहन, बहू, बेटी, बेटे को उस अदृश्य दुश्मन ने डस लिया है...दु:ख से भीगी सिसकियां और दहाड़े किसी को सोने नहीं देतीं, फिर राजबाड़ा भला कैसे सो सकता है? वह तो इस शहर का सबसे बुजुर्ग सदस्य है। उसे तो हर हाल में धीरज धरना होगा। वह अपनी छाती पर पत्थर बांधकर, अपने आंसुओं को पीकर, दु:खी नगर के गालों पर ढलक आए आंसुओं को पोंछ रहा है। किसी के सिर पर तो किसी की पीठ पर हाथ धरकर भर्राए और थरथराते स्वर में  ढांढस बंधा रहा है... मैं यह लिखते हुए राजबाड़ा को भीतर ही भीतर टूटते हुए देख रहा हूं... मुझे मतिभ्रम हो रहा है, जैसे सारा शहर राजबाड़े के कांधे पर सिर रखकर सुबक रहा है और अपने लोगों के इस शोक में स्वयं राजबाड़े की आंखें भी डबडबा आई हैं...! अब उसे कौन ढांढस बंधा सकता है? शायद परमपिता, जो शायद अभी किसी और दुनिया के दु:ख दूर करने में व्यस्त है...!